शुष्क क्षैत्रो में केर की वैज्ञानिक खेती

केर शुष्क और अर्धशुष्क क्षैत्रो में पाया जाने वाला पति रहित झाड़ीनुमा फलवृक्ष है यह एक जंगली प्रजाति का फल है यह पौष्टिक गुणों की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण फल है जिसका उपयोग आचार, सब्जी के रूप में किया जाता है यह कांटेदार होने के कारण इसका उपयोग खेत की सुरक्षा के लिए भी किया जाता है।

इसकी छाल का उपयोग खांसी, दमा और गठिया में भी किया जाता है इसका फल दुर्बलता और पित दोष में लाभकारी होते है इसकी लकड़ी का उपयोग जलाने के लिए किया जाता है इसके फल में जर्नल ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री में प्रकाशित लेख के अनुसार प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट, फाइबर, विटामिन सी, कैल्शियम और फॉस्फोरस अच्छी मात्रा में पाये जाते है जो एक मनुष्य की आवश्यकता भी है।

जलवायु

            यह एक जीरो फैइटिक वृक्ष है जिसके लिए  शुष्क और अर्धशुष्क जलवायु उचित रहती है इसके पौधे गर्मियों में 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास तापमान पर भी जीवित रहते है व सामान्य रूप से 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उचित रहता है।

भूमि

            केर विभिन्न प्रकार की बंजर भूमियो में भी आसानी से उगाया जा सकता है परन्तु रेतीली भूमि में जड़ो का अच्छा विकास हो जाता है व अच्छे जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए यह काफी हद तक लवणता सहनशील भी है।

प्रवर्धन

            केर के मुख्य रूप से बीज व कलम द्वारा पौधे तैयार करते है बीज वाले पौधे सात से आठ साल में फल देते है व कलम वाले पौधे रोपाई से तीन से चार साल बाद फल देना शुरू कर देते है बीज परिपक्व फलो से निकाले जाते है बीजो को नर्शरी में क्यारियों या पॉलीथिन बैग में बोया जाता है 10 से 15 में अंकुरित हो जाते है व एक वर्ष के भीतर रोपण योग्य हो जाते है कलम के माध्यम से पौधा तैयार करने के दौरान कलम दाब विधि को उपयुक्त माना है इस विधि से पौधे बारिश के मौसम में तैयार किये जाते है लेकिन बीज से पौधे तैयार करना आसान है।

खेत तैयार करना व पौधा रोपण

            खेत में 2  से 3 जुताई करके खुला छोड़ दे उसके बाद रोटावेटर चला कर खेत को भुरभुरा कर ले।  फिर पाटा चलाकर खेत को समतल बना ले फिर उचित दूरी पर गड्डे खोद कर तैयार कर ले गड्डे लगभग एक से डेढ़ महीने पहले खोद ले।  गड्डो में 50 : 50 मिटटी व गोबर के खाद के मिश्रण से भरे।  गड्डे 3 X 3 मीटर की उचित दूरी पर खोदे।  पोधो की रोपाई बारिश के मौषम में करना चाहिए। क्योकि इस समय उचित वातावरण मिलता है जिससे पोधो का विकास अच्छा होता है ।

सिंचाई व खरपतवार प्रबंधन

            केर के पोधो को सिंचाई की विशेष आवश्यकता नहीं होती है।  फिर भी शुरुवात में रोपाई के बाद सिचाई करे व सर्दियों में डेढ़ से दो महीने से सिचाई करे बारिश में जरूरत नहीं रहती है खरपतवार समय समय पर देककर  निकालते रहे जिससे खेत की साफ़ सफाई रहती है व उपज अच्छी मिलती है।

खाद एवं उर्वरक

            केर को विशेष खाद व उर्वरक की जरूरत नहीं पड़ती फिर भी १० से १५ किलो प्रति पौधा गोबर की खाद को मिटटी में मिलाकर गड्डो में डाले।

किस्मे

            केर की कोई किस्म प्रचलित नहीं है। अभी तक इसके प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले पोधो से ही पौध और बीज तैयार करके उन्हें ही लगाते है इसकी बढ़ती हुई मांग को देखते हुई अब इसपे अनुसंधान कार्य हो रहे है अब इसकी किस्मो के विकास पर काम चल रहा है।

फलो की तुड़ाई

            केर के पोधो पर फल वर्ष में दो बार आते है मई व अक्टूबर – नवंबर में आते है मई में आने वाले फलो की गुणवत्ता व पैदावार दोनों अच्छी होती है जब की अक्टूबर – नवंबर वाले फलो की पैदावार व गुणवत्ता कम होती है आचार व सब्जी के रूप में कच्चे फलो का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हे पकने से पहले हरी अवस्था में ही तोड़ लिया जाता है।

उपज

            केर के प्रति पौधा उपज 15 किलो तक प्राप्त होती है।

कीट व रोग

            इस फल वृक्ष में कोई विशेष कीट रोग नहीं लगते है।

लेखक विवरण

(*ओम प्रकाश जीतरवाल1, केशर मल चौधरी2 बाबू लाल धायल1 एवं सुशील1)

1चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा

2श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, राजस्थान

*omprakashjitarwal@gmail.com

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